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MuktiBodh_Part28

(हम पढ़ रहे हैं मुक्तिबोध पेज नंबर 54)

(राग बिलावल का शब्द नं. 25 पढ़ें, भक्ति की अजब प्रेरणा है।)
◆ कर साहिब की भक्ति, बैरागर लै रे। समरथ सांई शीश पर, तो कूं क्या भै रै।।टेक।। शील संतोष बिबेक हैं, और ज्ञान दिवाना। दया धर्म चित चौंतरै, बांचो प्रवाना।।1।। 
धर्म ध्वजा जहा फरहरैं, होंहि जगि जौंनारा। कथा कीरतन होत हैं, साहिब दरबारा।।2।।
 समता माता मित्र हैं, रख अकल यकीनं। सत्तर पड़दे खुल्हत हैं, दिल में दुरबीनं।।3।।
 जा कै पिता बिबेक से, और भाव से भाई। या पटतर नहीं और है, कछु बयाह न सगाई।।4।। 
दृढ कै डूंगर चढ गये, जहां गुफा अनादं। लागी शब्द समाधि रे, धन्य सतगुरु साधं ।।5।। 
सहमुखी जहां गंग है, तालव त्रिबैनी। जहां ध्यान असनान कर, परवी सुख चैनी।।6।। 
कोटि कर्म कुसमल कटैं, उस परबी न्हाये। वोह साहिब राजी नहीं, कछु नाचे गाये।।7।। 
अगर मूल महकंत हैं, जहां गंध सुगंधा। एक पलक के ध्यान सैं, कटि हैं सब फंदा।।8।। 
दो पुड़ की भाठी चवै, जहां सुष्मण पोता। इडा पिंगुला एक कर, सुख सागर गोता।।9।। 
अबल बली बरियाम है, निरगुण निरबानी। अनंत कोटि बाजे बजैं, बाजै सहदानी।।10।।

तन मन निश्चल हो गया, निज पद सें लागे। एक पलक के ध्यान सैं, दूंदर सब भागे।।11।। प्रपटन के घाट में, एक पिंगुल पंथा। छूटैं फुहारे नूर के, जहां धार अनंता।।12।। 
झिलमिल झिलमिल होत है, उस पुरि में भाई। घाट बाट पावै नहीं, है द्वारा राई।।13।।
 तहां वहां संख सुरंग हैं, मघ औघट घाटा। सतगुरु मिलैं कबीर से, तब खुलैं कपाटा।।14।। 
संख कंवल जहां जगमगे, पीतांबर छाया। सूरज संख सुभान हैं, अबिनाशी राया।।15।।
 अगर डोर सें चढि गये, धरि अलल धियाना। दास गरीब कबीर का, पाया अस्थाना।।16।।25।।

◆ वाणी नं. 42 :-
गरीब, काया माया खंड है, खंड राज और पाठ। अमर नाम निज बंदगी, सतगुरु सें भइ साट।।42।।
● सरलार्थ :- संत गरीबदास जी ने बताया है कि काया यानि शरीर तथा माया यानि धन,
राजपाट यानि राज्य सब खण्ड (नाश) हो जाता है। केवल निज नाम (वास्तविक भक्ति मंत्र)
के नाम की साधना सतगुरू से लेकर की गई कमाई (भक्ति धन) अमर है।
◆ वाणी नं. 43 :-
गरीब, अमर अनाहद नाम है, निरभय अपरंपार। रहता रमता राम है, सतगुरु चरण जुहार।।43।।
● सरलार्थ :- परमात्मा रमता यानि विचरण करता हुआ चलता-फिरता है। वह सतगुरू
रूप में मिलता है। उसके चरणों में प्रणाम करके भक्ति की भीख प्राप्त करें। उनके द्वारा
दिया गया नाम अनाहद (सीमा रहित) अमर (अविनाशी) मोक्ष देने वाला है। वह नाम प्राप्त
कर जो निर्भय बनाता है। उसकी महिमा का कोई वार-पार नहीं है अर्थात् वास्तविक मंत्र की महिमा असीम है।
● वाणी नं. 44 :-
गरीब, अविनासी निहचल सदा, करता कूं कुरबान। जाप अजपा जपत है, गगन मंडल धरि ध्यान।।44।।
● सरलार्थ :- उस अविनाशी कर्ता (सृष्टि रचनहार) पर कुर्बान हो जा जो निश्चल
(स्थाई) है। उसके नाम का अजपा यानि मन-मन में श्वांस द्वारा स्मरण कर (जाप कर) और
गगन मण्डल में ध्यान रख कि परमेश्वर (सतपुरूष) ऊपर सतलोक में विराजमान है। मैंने
भी वहीं जाना है। वह सुखदाई स्थान है। वहाँ जन्म-मरण नहीं है। कोई राग-द्वेष नहीं है। सब प्रेम से रहते हैं। युवा रहते हैं।
● वाणी नं. 45 :-
गरीब, बिन रसना ह्नै बदंगी, निज चसमों दीदार। निज श्रवण बानी सुनै, निरमल तत्त्व निहार।।45।
 ◆सरलार्थ :- सतगुरू द्वारा दीक्षा में दिए वास्तविक नामों का जाप विधि अनुसार करने
से यानि बिना रसना (जीभ) के बंदगी (नम्र भाव से स्मरण) यानि अजपा जाप करने से बिन
चिसमों (बिना चर्म दृष्टि) के यानि दिव्य दृष्टि से परमेश्वर का दीदार (दर्शन) होता है। बिन
श्रवण (बिना कानों) के यानि आत्मा के कानों से आए लोक की वाणी सुनाई देती है। उस
निर्मल तत्व यानि पवित्रा परमेश्वर को निहार यानि एकटक देख।
आगे अगले भाग में पढ़ेंगे....

क्रमशः..........
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