प्रभुओं में समर्थ प्रभु ही कल्याणकारक है।(सांई माने मालिक-प्रभु) संतों में तत्वदर्शी संत ही उद्धार करने वाले हैं। नामों में सत्यनाम तथा सारनाम ही मोक्ष के हैं तथा परमात्मा की शक्ति का कोई अंत नहीं। वेद में (कविरमितौजा) यानि कविर्देव (अमित) असीमित (औजा) शक्ति वाले हैं।(27) ◆ द्रोपदी पूर्व जन्म में परमात्मा की भक्ति करती थी। परमात्मा अनेकों वेश बनाकर भक्तों को प्रोत्साहित करते रहते हैं। परमात्मा गुरू-ऋषि रूप में नगरी के पास आश्रम बनाकर रहते थे। कंवारी द्रोपदी को भी अन्य सहेलियों के साथ प्रथम मंत्र पाँच नाम वाला प्राप्त था। विवाह के पश्चात् पाण्डवों के साथ श्री कृष्ण जी को गुरू धारण कर लिया था। जो यथार्थ नाम इन देवों के हैं, उनका जाप करती थी। जिस कारण परमेश्वर जी ने अंधे का रूप धारकर साड़ी का टुकड़ा दान लिया। फिर उसकी रक्षा की यानि द्रोपदी का चीर बढ़ाया। दुःशासन जैसे योद्धा चीर उतारते-उतारते थक गए, ढ़ेर लग गया, परंतु चीर का अंत नहीं आया। इस प्रकार दान करने की प्रेरणा किसी जन्म में निज नाम की भक्ति करने का फल है। श्री रामचन्द्र जी ने श्रीलंका जाने के लिए समुद्र पर पुल बनाना चाहा तो पर...