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Showing posts from May, 2020

निरबांन निरंजन चीन्हि भईया

निरबांन निरंजन चीन्हि भईया,  दुःख दालिद्र मोक्ष करै करता। गर्भवास मिटै निज नाम रटो,  क्यों जुगन जुगन चोले धरता।। चल थीर करो अविगत नगरी, तूं लख चौरासी क्यूं फिरता। सत संगति ले निज साधुन की, नहीं नाम बिना कारज सरता।। २।। दयावंत विवेक भये ज्ञानी,  टुक छेर कर्यो से सब लरता। चुण्डित मुण्डित सब पकरि लिये, इन से जम किंकर ना डरता।। ३।। तूं कौन कहां से आंनि फंध्या, देखो आगि बिरानी क्यूं जरता। समझे नहीं सोख शूद्र गहले, बड़े भूत भये जोय पिण्ड भरता।। ४ ।। मुक्ता होने का भेद कहूँ, चल चौंर सुहंगम जित ढुरता। कहै दास गरीब निवास सदा, जहां नाद अखंड अजब घुरता।। ५।।

अथ जरना का अंग

गरीब, ऐसी जरना चाहिये, ज्यूं पृथ्वी तत्त थीर। खोदे से कसकै नहीं,ऐसा बज्र शरीर।। गरीब, ऐसी जरना चाहिये, ज्यूं अप तेज अनूप।न्हावै धोवै थूक दे, तामस नहीं सरूप।| गरीब, ऐसी जरना चाहिये, ज्यूं पौन तत्त परवान। कुटिल बचन कोई कहो,मानै नहीं अमान।। गरीब, ऐसी जरना चाहिये, ज्यूं अग्नि तत्त में होय। जो कुछ पडै सो सब जरै, बुरा न बाचै कोय।। गरीब,ऐसी जरना चाहिये,ज्यूं गगन तत्त गलतान। बुरा भला बांचै नहीं, ता सकल समान।।५।। गरीब,ऐसी जरना ज्यूं तरुवर के तीर। काटे चीरे कष्ट कूँ, तो भी है धीर।। गरीब, वृक्ष नदी और साध जन, तिहुँवा एक सुभाव । जल न्हावै फल वृक्ष दे,साध लखावै दाव।। गरीब, ऐसी जरना चाहिये, ज्यूं घनहर जल मेह, सब ही ऊपर बरषता, ना दिल द्वेष स्नेह।। गरीब, दीठी अन दीठी करै, जिनकी ल्यौं मैं दाद। संग से कदे न बीछरुं, खेलौं आदि अनाद।। गरीब, दीठी अन दीठी करै, करै, जिनकी ल्यौं मैं दाद संग से कदे न बीछरूं, परम सनेही साध।। गरीब, दीठी अन दीठी करै, जिनकी ल्यों मैं दाद। संग से कदे न बीछरूं, हरदम नाम अराध ।। गरीब, दीठी अन दीठी करै, सब अपने सिर लेय। संग से कदे न बीछरूं, जो मुझ सरबस देय।। गर...