निरबांन निरंजन चीन्हि भईया,
दुःख दालिद्र मोक्ष करै करता।
गर्भवास मिटै निज नाम रटो,
क्यों जुगन जुगन चोले धरता।।
चल थीर करो अविगत नगरी,
तूं लख चौरासी क्यूं फिरता।
सत संगति ले निज साधुन की,
नहीं नाम बिना कारज सरता।। २।।
दयावंत विवेक भये ज्ञानी,
टुक छेर कर्यो से सब लरता।
चुण्डित मुण्डित सब पकरि लिये,
इन से जम किंकर ना डरता।। ३।।
तूं कौन कहां से आंनि फंध्या,
देखो आगि बिरानी क्यूं जरता।
समझे नहीं सोख शूद्र गहले,
बड़े भूत भये जोय पिण्ड भरता।। ४ ।।
मुक्ता होने का भेद कहूँ,
चल चौंर सुहंगम जित ढुरता।
कहै दास गरीब निवास सदा,
जहां नाद अखंड अजब घुरता।। ५।।
दुःख दालिद्र मोक्ष करै करता।
गर्भवास मिटै निज नाम रटो,
क्यों जुगन जुगन चोले धरता।।
चल थीर करो अविगत नगरी,
तूं लख चौरासी क्यूं फिरता।
सत संगति ले निज साधुन की,
नहीं नाम बिना कारज सरता।। २।।
दयावंत विवेक भये ज्ञानी,
टुक छेर कर्यो से सब लरता।
चुण्डित मुण्डित सब पकरि लिये,
इन से जम किंकर ना डरता।। ३।।
तूं कौन कहां से आंनि फंध्या,
देखो आगि बिरानी क्यूं जरता।
समझे नहीं सोख शूद्र गहले,
बड़े भूत भये जोय पिण्ड भरता।। ४ ।।
मुक्ता होने का भेद कहूँ,
चल चौंर सुहंगम जित ढुरता।
कहै दास गरीब निवास सदा,
जहां नाद अखंड अजब घुरता।। ५।।
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