गरीब, ऐसी जरना चाहिये, ज्यूं पृथ्वी तत्त थीर। खोदे से कसकै नहीं,ऐसा बज्र शरीर।।
गरीब, ऐसी जरना चाहिये, ज्यूं अप तेज अनूप।न्हावै धोवै थूक दे, तामस नहीं सरूप।|
गरीब, ऐसी जरना चाहिये, ज्यूं पौन तत्त परवान। कुटिल बचन कोई कहो,मानै नहीं अमान।।
गरीब, ऐसी जरना चाहिये, ज्यूं अग्नि तत्त में होय।
जो कुछ पडै सो सब जरै, बुरा न बाचै कोय।।
गरीब,ऐसी जरना चाहिये,ज्यूं गगन तत्त गलतान।
बुरा भला बांचै नहीं, ता सकल समान।।५।।
गरीब,ऐसी जरना ज्यूं तरुवर के तीर।
काटे चीरे कष्ट कूँ, तो भी है धीर।।
गरीब, वृक्ष नदी और साध जन, तिहुँवा एक सुभाव ।
जल न्हावै फल वृक्ष दे,साध लखावै दाव।।
गरीब, ऐसी जरना चाहिये, ज्यूं घनहर जल मेह, सब ही ऊपर बरषता,
ना दिल द्वेष स्नेह।।
गरीब, दीठी अन दीठी करै, जिनकी ल्यौं मैं दाद।
संग से कदे न बीछरुं, खेलौं आदि अनाद।।
गरीब, दीठी अन दीठी करै,
करै, जिनकी ल्यौं मैं दाद
संग से कदे न बीछरूं, परम सनेही साध।।
गरीब, दीठी अन दीठी करै, जिनकी ल्यों मैं दाद।
संग से कदे न बीछरूं, हरदम नाम अराध ।।
गरीब, दीठी अन दीठी करै, सब अपने सिर लेय।
संग से कदे न बीछरूं, जो मुझ सरबस देय।।
गरीब, दीठी अन दीटी करै, जिन के हूँ मैं संग।
भक्ति पुरातम देत हूँ, चढत नवेला रंग।।
गरीब, दीटी अन दीटी करै, जिन के हूँ मैं साथ। भक्ति पुरातम देत हूँ, पीडा लगे न गात।।
गरीब, दीटी अन दीटी करै, जिन के हूँ मैं तीर।
वज्र टूटते राखि हूँ, पीड़ा नहीं शरीर ।।
गरीब, दीटी अन दीटी करै, सो साधू प्रवीन।
नाम रते निरबंध है, छाडे दोनुं दीन ।।
गरीब, दीटी अन दीटी कर, सो साधू सिर पोस।
जो बीत सो सिर धरै, देव न काहूँ दोष।।
गरीब, दीटी कुँ कह देत है, जिन के दिल नहीं थीर।
जाके संग हम ना रहैं, सो कुटन बेपीर ।।
गरीब, ऐसी जरना चाहिये, ज्यूं अप तेज अनूप।न्हावै धोवै थूक दे, तामस नहीं सरूप।|
गरीब, ऐसी जरना चाहिये, ज्यूं पौन तत्त परवान। कुटिल बचन कोई कहो,मानै नहीं अमान।।
गरीब, ऐसी जरना चाहिये, ज्यूं अग्नि तत्त में होय।
जो कुछ पडै सो सब जरै, बुरा न बाचै कोय।।
गरीब,ऐसी जरना चाहिये,ज्यूं गगन तत्त गलतान।
बुरा भला बांचै नहीं, ता सकल समान।।५।।
गरीब,ऐसी जरना ज्यूं तरुवर के तीर।
काटे चीरे कष्ट कूँ, तो भी है धीर।।
गरीब, वृक्ष नदी और साध जन, तिहुँवा एक सुभाव ।
जल न्हावै फल वृक्ष दे,साध लखावै दाव।।
गरीब, ऐसी जरना चाहिये, ज्यूं घनहर जल मेह, सब ही ऊपर बरषता,
ना दिल द्वेष स्नेह।।
गरीब, दीठी अन दीठी करै, जिनकी ल्यौं मैं दाद।
संग से कदे न बीछरुं, खेलौं आदि अनाद।।
गरीब, दीठी अन दीठी करै,
करै, जिनकी ल्यौं मैं दाद
संग से कदे न बीछरूं, परम सनेही साध।।
गरीब, दीठी अन दीठी करै, जिनकी ल्यों मैं दाद।
संग से कदे न बीछरूं, हरदम नाम अराध ।।
गरीब, दीठी अन दीठी करै, सब अपने सिर लेय।
संग से कदे न बीछरूं, जो मुझ सरबस देय।।
गरीब, दीठी अन दीटी करै, जिन के हूँ मैं संग।
भक्ति पुरातम देत हूँ, चढत नवेला रंग।।
गरीब, दीटी अन दीटी करै, जिन के हूँ मैं साथ। भक्ति पुरातम देत हूँ, पीडा लगे न गात।।
गरीब, दीटी अन दीटी करै, जिन के हूँ मैं तीर।
वज्र टूटते राखि हूँ, पीड़ा नहीं शरीर ।।
गरीब, दीटी अन दीटी करै, सो साधू प्रवीन।
नाम रते निरबंध है, छाडे दोनुं दीन ।।
गरीब, दीटी अन दीटी कर, सो साधू सिर पोस।
जो बीत सो सिर धरै, देव न काहूँ दोष।।
गरीब, दीटी कुँ कह देत है, जिन के दिल नहीं थीर।
जाके संग हम ना रहैं, सो कुटन बेपीर ।।

बहुत अच्छा लगा
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